श्री शिव प्रश्नावलीश्री रामचरितमानस के रुद्राष्टक पर आधारित

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भगवान शिव, राजा रवि वर्मा के चित्र पर आधारित
  1. भगवान शिव का स्मरण कर सच्चे हृदय से प्रार्थना करें
  2. अपना प्रश्न मन में स्पष्ट रूप से सोचें
  3. नीचे चक्र में जिस अंक पर मन जाए, उसे स्पर्श करें
  4. नीचे अपना श्लोक और उत्तर पढ़ें
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शिव प्रश्नावली क्या है?

यह शिव प्रश्नावली रुद्राष्टक पर आधारित है, भगवान शिव की वह आठ श्लोकों की स्तुति जो गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में रखी है, जहाँ एक मुनि शिव जी को प्रसन्न करने के लिए इसे गाते हैं। सोमवार, श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर इसका पाठ घर-घर होता है।

चक्र में 36 अंक हैं। आप जो अंक चुनते हैं, वह आठ श्लोकों में से किसी एक या फलश्रुति के श्लोक तक ले जाता है, कुल नौ उत्तर। हर श्लोक 36 अंकों में चार बार आता है, इसलिए हर उत्तर की संभावना बराबर है। श्लोक संस्कृत में, उसका अर्थ और आपके प्रश्न के लिए उसका फल नीचे दिखाई देता है।

भक्त इसे महादेव प्रश्नावली, भोलेनाथ प्रश्नावली या शंकर जी की प्रश्नावली भी कहते हैं; चक्र वही है। हर श्लोक अर्थ सहित दिया है, इसलिए यह पृष्ठ पूरे रुद्राष्टक का हिंदी अर्थ सहित पाठ भी है।

पूरा रुद्राष्टक अर्थ सहित पढ़ें

आठ श्लोक, फलश्रुति और उनके उत्तर

  1. नमामीशमीशान निर्वाणरूपम्। विभुम् व्यापकम् ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
    निजम् निर्गुणम् निर्विकल्पम् निरीहम्। चिदाकाशमाकाशवासम् भजेऽहम्॥१॥

    मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापक, वेदों के कहे ब्रह्म, सबके स्वामी शिव को मैं नमन करता हूँ। जो अपने ही स्वरूप में स्थित हैं, गुणों और भेदों से परे हैं, जिन्हें कोई कामना नहीं, जो चेतन आकाश हैं और आकाश को ही वस्त्र बनाए हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।
    आपका कार्य ठोस आधार पर है। शांत और स्पष्ट मन से आरम्भ करें, यह टिकेगा। यहाँ आपसे कुछ ऐसा नहीं माँगा जा रहा जो आप दे न सकें। (हाँ)
  2. निराकारमोंकारमूलम् तुरीयम्। गिराज्ञानगोतीतमीशम् गिरीशम्।
    करालम् महाकालकालम् कृपालम्। गुणागारसंसारपारम् नतोऽहम्॥२॥

    निराकार, ओंकार के मूल, तीनों अवस्थाओं से परे तुरीय, वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से अतीत, कैलासपति शिव; जो विकराल हैं, महाकाल के भी काल हैं और फिर भी कृपालु हैं; जो गुणों के धाम हैं और संसार से परे हैं, उन्हें मैं नमन करता हूँ।
    जिससे आप डर रहे हैं, वह उतना बड़ा नहीं जितना दिखता है। जो काल के भी काल हैं, उन्हें उसी साँस में कृपालु कहा गया है। निर्भय होकर आगे बढ़ें। (हाँ)
  3. तुषाराद्रिसंकाशगौरम् गभीरम्। मनोभूतकोटि प्रभाश्रीशरीरम्।
    स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारुगंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥३॥

    जो हिमालय के समान गौर और सागर के समान गम्भीर हैं, जिनके शरीर की शोभा करोड़ों कामदेवों से बढ़कर है; जिनकी जटाओं में सुंदर गंगा लहराती है, ललाट पर बाल चन्द्रमा चमकता है और कण्ठ में सर्प विराजता है।
    यहाँ सौंदर्य और विष साथ-साथ हैं: जटा में गंगा, कण्ठ में सर्प। कार्य अच्छा है, पर उसमें कुछ ऐसा है जिसे सँभालकर रखना होगा। धीरे चलें। (प्रतीक्षा)
  4. चलत्कुण्डलम् भ्रूसुनेत्रम् विशालम्। प्रसन्नाननम् नीलकण्ठम् दयालम्।
    मृगाधीश चर्माम्बरम् मुण्डमालम्। प्रियम् शंकरम् सर्वनाथम् भजामि॥४॥

    जिनके कानों में कुण्डल हिलते हैं, जिनकी भौंहें सुंदर और नेत्र विशाल हैं, जिनका मुख प्रसन्न है, कण्ठ नीला है और जो दयालु हैं; जो सिंहचर्म पहने और मुण्डमाला धारण किए हैं, उन सबके प्रिय, सबके नाथ शंकर को मैं भजता हूँ।
    मुख प्रसन्न है और कण्ठ में अब भी वह विष है जो उन्होंने संसार के लिए पिया। जो दूसरों का भार उठाते हैं, उनका भार उठाया जाता है। आपका कार्य बनेगा, और यदि वह केवल आपके लिए नहीं है तो और अच्छा बनेगा। (हाँ)
  5. प्रचण्डम् प्रकृष्टम् प्रगल्भम् परेशम्। अखण्डम् अजम् भानुकोटिप्रकाशम्।
    त्रयः शूलनिर्मूलनम् शूलपाणिम्। भजेऽहम् भवानीपतिम् भावगम्यम्॥५॥

    जो प्रचण्ड हैं, श्रेष्ठ हैं, तेजस्वी हैं, परमेश्वर हैं; अखण्ड, अजन्मा और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान हैं; जो हाथ में त्रिशूल लिए तीनों तापों को जड़ से मिटाते हैं; जो केवल भाव से मिलते हैं, उन भवानीपति को मैं भजता हूँ।
    यहाँ तीनों ताप जड़ से मिटाए जा रहे हैं। जो बोझ आप लम्बे समय से उठाए हैं, वह उतरने वाला है। साहस से काम लें, बल आपके साथ है। (हाँ)
  6. कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारि।
    चिदानन्द सन्दोह मोहापहारि। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारि॥६॥

    जो काल की कलाओं से परे हैं, कल्याणस्वरूप हैं, कल्प का अंत करने वाले हैं; जो सज्जनों को सदा आनन्द देते हैं, त्रिपुर के शत्रु हैं; जो चिदानन्द के समूह और मोह को हरने वाले हैं, हे कामदेव के शत्रु प्रभु, प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।
    इस कार्य में एक अंत भी जुड़ा है। नया आने से पहले कुछ पुराना समाप्त होना है, और उसे जबरन नहीं किया जा सकता। श्लोक की तरह दो बार विनती करें, उत्तर अपने समय पर आएगा। (प्रतीक्षा)
  7. न यावद् उमानाथपादारविन्दम्। भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
    न तावत्सुखम् शान्ति सन्तापनाशम्। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥७॥

    जब तक मनुष्य उमापति के चरणकमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न इस लोक में सुख-शांति मिलती है, न परलोक में, और न उनके तापों का नाश होता है। हे समस्त प्राणियों में बसने वाले प्रभु, प्रसन्न हों।
    अभी नहीं। श्लोक साफ कहता है कि इस मार्ग से शांति नहीं मिलती। इस बात को अभी रख दें, प्रार्थना और अपने कर्तव्य की ओर लौटें, और कुछ दिनों बाद फिर पूछें। (अभी नहीं)
  8. न जानामि योगम् जपम् नैव पूजाम्। नतोऽहम् सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।
    जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानम्। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥८॥

    मैं न योग जानता हूँ, न जप, न पूजा। हे शम्भु, मैं तो सदा-सर्वदा केवल आपको नमन करता हूँ। जन्म, जरा और दुःखों की बाढ़ में जलते हुए मुझ शरणागत की, हे प्रभु, रक्षा करें।
    आपको विशेषज्ञ या पूरी तरह तैयार होने की आवश्यकता नहीं है। जैसे हैं वैसे ही जाएँ और सहायता माँगें, सहायता मिलेगी। हाँ, विनम्रता के साथ। (हाँ)
  9. रुद्राष्टकमिदम् प्रोक्तम् विप्रेण हरतोषये।
    ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषाम् शम्भुः प्रसीदति॥

    रुद्र का यह अष्टक ब्राह्मण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। जो मनुष्य इसे भक्ति से पढ़ते हैं, उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं।
    फल आपके लगे रहने पर निर्भर है। यह एक बार के प्रयास को नहीं, निरंतर भक्ति को मिलता है। अभी पूरा नहीं हुआ है; लगे रहें, मिलेगा। (प्रतीक्षा)

प्रश्नावली के नियम

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या शिव प्रश्नावली निःशुल्क है?

हाँ। यह पूरी तरह निःशुल्क है, न कोई पंजीकरण, न कोई लॉगिन।

श्लोक कहाँ से लिए गए हैं?

गोस्वामी तुलसीदास जी की श्री रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड के रुद्राष्टक से: उसके आठ श्लोक और फलश्रुति का श्लोक।

क्या यही महादेव या भोलेनाथ प्रश्नावली है?

हाँ। शिव, महादेव, भोलेनाथ और शंकर एक ही भगवान के नाम हैं, और यही उन सबकी प्रश्नावली है।

क्या उत्तर हाँ या नहीं में मिलता है?

हर उत्तर के अंत में हाँ, प्रतीक्षा या अभी नहीं लिखा है, साथ में श्लोक और उसका अर्थ।

क्या एक ही प्रश्न दोबारा पूछ सकते हैं?

परम्परा के अनुसार एक ही प्रश्न उसी दिन दोबारा नहीं पूछना चाहिए।

क्या यह उत्तर सत्य होते हैं?

प्रश्नावली एक भक्ति-साधना है। भक्त श्रद्धा से उत्तर पढ़ते हैं और उसमें मार्गदर्शन पाते हैं। यह किसी परिणाम की गारंटी नहीं है।

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प्रश्नावली एक भक्ति-साधना है। महत्वपूर्ण निर्णयों में अपने विवेक का उपयोग करें और योग्य सलाह लें। गोपनीयता नीति.

चित्र: राजा रवि वर्मा, गंगावतरण (सार्वजनिक अधिकार क्षेत्र), साइट के रंग में ढाला गया।